सियासत को लेकर हिंदी शायरी

सियासत को लेकर हिंदी शायरी

फलसफा समझो न असरारे सियासत समझो,
जिन्दगी सिर्फ हकीक़त है हकीक़त समझो,
जाने किस दिन हो हवायें भी नीलाम यहाँ,
आज तो साँस भी लेते हो ग़नीमत समझो।
समझने ही नहीं देती सियासत हम को सच्चाई,
कभी चेहरा नहीं मिलता कभी दर्पन नहीं मिलता
बुलंदी का नशा सिमतों का जादू तोड़ देती है,
हवा उड़ते हुए पंछी के बाज़ू तोड़ देती है,
सियासी भेड़ियों थोड़ी बहुत गैरत ज़रूरी है,
तवायफ तक किसी मौके पे घुंघरू तोड़ देती है

इन से उम्मीद न रख हैं ये सियासत वाले,
ये किसी से भी मोहब्बत नहीं करने वाले।

एक आँसू भी हुकूमत के लिए ख़तरा है,
तुम ने देखा नहीं आँखों का समुंदर होना।

लड़ें, झगड़ें, भिड़ें, काटें, कटें, शमशीर हो जाएँ,
बटें, बाँटें, चुभे इक दुसरे को, तीर हो जाएँ,
मुसलसल कत्ल-ओ-गारत की नई तस्वीर हो जाएँ,
सियासत चाहती है हम और तुम कश्मीर हो जाएँ

सियासत इस कदर अवाम पे अहसान करती है,
आँखे छीन लेती है फिर चश्में दान करती है।

ऐ सियासत तूने भी इस दौर में कमाल कर दिया,
गरीबों को गरीब अमीरों को माला-माल कर दिया।

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