हमें अपनी कमी से ख़तरा है--जौन एलिया | hume apni kami se khatara -jaun eliys

दोस्तो आज आपके सामने प्रस्तुत हैं पाकिस्तान के महसूर शायर जॉन एलिया के कुछ शायरी  जिसे पाठको द्वारा बहुत पसंद किया गया  जॉन एलिया के बारे में कहा जाता हैं कि वो अपनी शायरों में खून थूकते है  मतलब बहुत ज्यादा दिल पर लगती है  चलो आज हम इनकी की कुछ सेर पढते हैं


ऐश-ए-उम्मीद ही से ख़तरा है
दिल को अब दिल-दही से ख़तरा है
है कुछ ऐसा कि उस की जल्वत में
हमें अपनी कमी से ख़तरा है
जिस के आग़ोश का हूँ दीवाना
उस के आग़ोश ही से ख़तरा है
याद की धूप तो है रोज़ की बात
हाँ मुझे चाँदनी से ख़तरा है
है अजब कुछ मोआ’मला दरपेश
 
अक़्ल को आगही से ख़तरा है
शहर-ए-ग़द्दार जान ले कि तुझे
एक अमरोहवी से ख़तरा है
है अजब तौर हालत-ए-गिर्या
कि मिज़ा को नमी से  है
हाल ख़ुश लखनऊ का दिल्ली का
बस उन्हें ‘मुसहफ़ी’ से ख़तरा है
आसमानों में है ख़ुदा तन्हा
और हर आदमी से ख़तरा है
मैं कहूँ किस तरह ये बात उस से
तुझ को जानम मुझी से ख़तरा है
आज भी ऐ कनार-ए-बान मुझे
तेरी इक साँवली से ख़तरा है
उन लबों का लहू न पी जाऊँ
अपनी तिश्ना-लबी से ख़तरा है
‘जौन’ ही तो है ‘जौन’ के दरपय
‘मीर’ को ‘मीर’ ही से ख़तरा है
अब नहीं कोई बात ख़तरे की
अब सभी को सभी से ख़तरा है
 
जौन एलिया
1931 – 2002कराची, पाकिस्तान
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